वन पर्व  अध्याय २०५

व्राह्मण उवाच

एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेन हि महामते |  २०   क
कामय़ा व्रूहि मे तथ्यं सर्वं त्वं प्रय़तात्मवान् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति