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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनस्य भवनं प्रविश्याप्रतिमं विभुः |  १   क
स्पृष्ट्वाम्भः पुण्डरीकाक्षः स्थण्डिले शुभलक्षणे |  १   ख
सन्तस्तार शुभां शय़्यां दर्भैर्वैडूर्यसंनिभैः ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति