वन पर्व  अध्याय २०५

व्याध उवाच

अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मनः |  २८   क
अजानता कृतमिदं मय़ेत्यथ तमव्रुवम् |  २८   ख
क्षन्तुमर्हसि मे व्रह्मन्निति चोक्तो मय़ा मुनिः ||  २८   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति