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वन पर्व
अध्याय २०५
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मार्कण्डेय़ उवाच
पतिशुश्रूषपरय़ा दान्तय़ा सत्यशीलय़ा |  ३   क
मिथिलाय़ां वसन्व्याधः स ते धर्मान्प्रवक्ष्यति ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति