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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन |  ४६   क
राजसूय़ं क्रतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तवानसि ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति