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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातुमिच्छत्यवनीश्वरो वः; पाञ्चालराजो द्रुपदो वरार्हाः |  १६   क
लक्ष्यस्य वेद्धारमिमं हि दृष्ट्वा; हर्षस्य नान्तं परिपश्यते सः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति