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शान्ति पर्व
अध्याय २९८
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याज्ञवल्क्य उवाच
श्रोत्रं त्वक्चैव चक्षुश्च जिह्वा घ्राणं च पञ्चमम् |  २१   क
सर्गं तु षष्ठमित्याहुर्वहुचिन्तात्मकं स्मृतम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति