वन पर्व  अध्याय २६८

मार्कण्डेय़ उवाच

मुच्यतां जानकी सीता न मे मोक्ष्यसि कर्हिचित् |  १६   क
अराक्षसमिमं लोकं कर्तास्मि निशितैः शरैः ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति