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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
न चैवोपय़िकी भार्या मानुषी कृपणा तव |  २१   क
विवशां धर्षय़ित्वा च कां त्वं प्रीतिमवाप्स्यसि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति