वन पर्व  अध्याय २०६

व्याध उवाच

एवं शप्तोऽहमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम |  १   क
अभिप्रसादय़मृषिं गिरा वाक्यविशारदम् ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति