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उद्योग पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
स कृत्वा पाण्डवान्सत्रं लोकं संमोहय़न्निव |  ११   क
अधर्मनिरतान्मूढान्दग्धुमिच्छति ते सुतान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति