वन पर्व  अध्याय २०६

व्राह्मण उवाच

आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वा परिरक्षतु |  २८   क
अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति