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वन पर्व
अध्याय २०६
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ऋषिरु उवाच
शूद्रय़ोनौ वर्तमानो धर्मज्ञो भविता ह्यसि |  ४   क
मातापित्रोश्च शुश्रूषां करिष्यसि न संशय़ः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति