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आदि पर्व
अध्याय २०७
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वैशम्पाय़न उवाच
कलिङ्गराष्ट्रद्वारेषु व्राह्मणाः पाण्डवानुगाः |  १०   क
अभ्यनुज्ञाय़ कौन्तेय़मुपावर्तन्त भारत ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति