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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
अहं तत्रावसं राजन्व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |  ९   क
तासां मे रजसा ध्वस्तं भैक्षमासीन्नराधिप ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति