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आदि पर्व
अध्याय २०७
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वैशम्पाय़न उवाच
हिरण्यविन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः |  ४   क
दृष्टवान्पर्वतश्रेष्ठं पुण्यान्याय़तनानि च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति