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शान्ति पर्व
अध्याय २०७
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गुरुरु उवाच
अत्रोपाय़ं प्रवक्ष्यामि यथावच्छास्त्रचक्षुषा |  १   क
तद्विज्ञानाच्चरन्प्राज्ञः प्राप्नुय़ात्परमां गतिम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति