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शान्ति पर्व
अध्याय २०७
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गुरुरु उवाच
सम्यग्वृत्तिर्व्रह्मलोकं प्राप्नुय़ान्मध्यमः सुरान् |  १०   क
द्विजाग्र्यो जाय़ते विद्वान्कन्यसीं वृत्तिमास्थितः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति