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शान्ति पर्व
अध्याय २०७
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गुरुरु उवाच
सुदुष्करं व्रह्मचर्यमुपाय़ं तत्र मे शृणु |  ११   क
सम्प्रवृत्तमुदीर्णं च निगृह्णीय़ाद्द्विजो मनः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति