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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
सा त्वा प्रसाद्य शिरसा याचे शत्रुनिवर्हण |  १७   क
प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द नाय़ं सञ्जीवते यदि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति