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शान्ति पर्व
अध्याय २०७
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गुरुरु उवाच
मध्ये च हृदय़स्यैका सिरा त्वत्र मनोवहा |  १९   क
शुक्रं सङ्कल्पजं नॄणां सर्वगात्रैर्विमुञ्चति ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति