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शान्ति पर्व
अध्याय २०७
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गुरुरु उवाच
सर्वेषामेव भूतानां पुरुषः श्रेष्ठ उच्यते |  २   क
पुरुषेभ्यो द्विजानाहुर्द्विजेभ्यो मन्त्रवादिनः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति