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शान्ति पर्व
अध्याय २०७
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गुरुरु उवाच
तस्मात्तदविघाताय़ कर्म कुर्यादकल्मषम् |  २७   क
रजस्तमश्च हित्वेह न तिर्यग्गतिमाप्नुय़ात् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति