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वन पर्व
अध्याय २०७
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वेमां धर्मसंय़ुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् |  १   क
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेय़ं तपस्विनम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति