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वन पर्व
अध्याय २०७
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथ सञ्चिन्तय़ामास भगवान्हव्यवाहनः |  १०   क
अन्योऽग्निरिह लोकानां व्रह्मणा सम्प्रवर्तितः |  १०   ख
अग्नित्वं विप्रनष्टं हि तप्यमानस्य मे तपः ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति