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वन पर्व
अध्याय २०७
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मार्कण्डेय़ उवाच
सोपासर्पच्छनैर्भीतस्तमुवाच तदाङ्गिराः |  १२   क
शीघ्रमेव भवस्वाग्निस्त्वं पुनर्लोकभावनः |  १२   ख
विज्ञातश्चासि लोकेषु त्रिषु संस्थानचारिषु ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति