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वन पर्व
अध्याय २०७
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अग्निरु उवाच
नष्टकीर्तिरहं लोके भवाञ्जातो हुताशनः |  १४   क
भवन्तमेव ज्ञास्यन्ति पावकं न तु मां जनाः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति