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वन पर्व
अध्याय २०७
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मार्कण्डेय़ उवाच
ज्ञात्वा प्रथमजं तं तु वह्नेराङ्गिरसं सुतम् |  १८   क
उपेत्य देवाः पप्रच्छुः कारणं तत्र भारत ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति