आदि पर्व  अध्याय २०८

वैशम्पाय़न उवाच

उत्कृष्ट एव तु ग्राहः सोऽर्जुनेन यशस्विना |  ११   क
वभूव नारी कल्याणी सर्वाभरणभूषिता |  ११   ख
दीप्यमाना श्रिय़ा राजन्दिव्यरूपा मनोरमा ||  ११   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति