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शान्ति पर्व
अध्याय १७२
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भीष्म उवाच
स्वभावादेव सन्दृश्य वर्तमानाः प्रवृत्तय़ः |  ११   क
स्वभावनिरताः सर्वाः परितप्ये न केनचित् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति