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शान्ति पर्व
अध्याय २०८
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गुरुरु उवाच
तानेव च यथा दस्यून्क्षिप्त्वा गच्छेच्छिवां दिशम् |  १४   क
तथा रजस्तमःकर्माण्युत्सृज्य प्राप्नुय़ात्सुखम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति