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शान्ति पर्व
अध्याय २०८
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गुरुरु उवाच
निगृहीतेन्द्रिय़स्यास्य कुर्वाणस्य मनो वशे |  १८   क
देवतास्ताः प्रकाशन्ते हृष्टा यान्ति तमीश्वरम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति