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द्रोण पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
जङ्गमाः स्थावरैः सार्धं नालं पार्थस्य संय़ुगे |  ३१   क
एवं ज्ञात्वा महाराज व्येतु ते भीर्धनञ्जय़े ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति