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शान्ति पर्व
अध्याय २०९
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गुरुरु उवाच
अत्राह को न्वय़ं भावः स्वप्ने विषय़वानिव |  ४   क
प्रलीनैरिन्द्रिय़ैर्देही वर्तते देहवानिव ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति