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वन पर्व
अध्याय २०९
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मार्कण्डेय़ उवाच
यस्तु न च्यवते नित्यं यशसा वर्चसा श्रिय़ा |  १२   क
अग्निर्निश्च्यवनो नाम पृथिवीं स्तौति केवलम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति