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वन पर्व
अध्याय २०९
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मार्कण्डेय़ उवाच
आक्रोशतां हि भूतानां यः करोति हि निष्कृतिम् |  १४   क
अग्निः स निष्कृतिर्नाम शोभय़त्यभिसेवितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति