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वन पर्व
अध्याय २०९
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मार्कण्डेय़ उवाच
यस्तु विश्वस्य जगतो वुद्धिमाक्रम्य तिष्ठति |  १६   क
तं प्राहुरध्यात्मविदो विश्वजिन्नाम पावकम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति