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वन पर्व
अध्याय २०९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तराग्निः श्रितो यो हि भुक्तं पचति देहिनाम् |  १७   क
स यज्ञे विश्वभुङ्नाम सर्वलोकेषु भारत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति