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वन पर्व
अध्याय २०९
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मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मचारी यतात्मा च सततं विपुलव्रतः |  १८   क
व्राह्मणाः पूजय़न्त्येनं पाकय़ज्ञेषु पावकम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति