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वन पर्व
अध्याय २०९
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मार्कण्डेय़ उवाच
उदग्द्वारं हविर्यस्य गृहे नित्यं प्रदीय़ते |  २१   क
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत्परमः स्मृतः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति