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वन पर्व
अध्याय २०९
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन |  २३   क
अतुल्यत्वात्कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति