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आदि पर्व
अध्याय २१
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सूत उवाच
त्वं विप्रैः सततमिहेज्यसे फलार्थं; वेदाङ्गेष्वतुलवलौघ गीय़से च |  १७   क
त्वद्धेतोर्यजनपराय़णा द्विजेन्द्रा; वेदाङ्गान्यभिगमय़न्ति सर्ववेदैः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति