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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
क्षत्रिय़स्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः |  ४७   क
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति