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शान्ति पर्व
अध्याय २१
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देवस्थान उवाच
य एवं वर्तते राजा राजधर्मविनिश्चितः |  १६   क
तस्याय़ं च परश्चैव लोकः स्यात्सफलो नृप |  १६   ख
निर्वाणं तु सुदुष्पारं वहुविघ्नं च मे मतम् ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति