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वन पर्व
अध्याय १६५
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अर्जुन उवाच
तिस्रः कोट्यः समाख्यातास्तुल्यरूपवलप्रभाः |  ११   क
तांस्तत्र जहि कौन्तेय़ गुर्वर्थस्ते भविष्यति ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति