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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
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व्राह्मण उवाच
सर्वमेवात्र विज्ञेय़ं चित्तं ज्ञानमवेक्षते |  २   क
रेतः शरीरभृत्काय़े विज्ञाता तु शरीरभृत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति