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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य वल्कलाजिनसंवृतः |  ३   क
वधूपरिवृतो राजा निर्ययौ भवनात्ततः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति