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सभा पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
कार्त्तिकस्य तु मासस्य प्रवृत्तं प्रथमेऽहनि |  १७   क
अनारतं दिवारात्रमविश्रान्तमवर्तत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति