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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितः |  ११   क
वाचय़ित्वा द्विजश्रेष्ठान्प्रणम्य शिरसाहुकम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति