वन पर्व  अध्याय २१

वासुदेव उवाच

समतीत्य वहून्देशान्गिरींश्च वहुपादपान् |  १४   क
सरांसि सरितश्चैव मार्त्तिकावतमासदम् ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति